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शनिवार, 5 मार्च 2016

व्यंग्य – बसंतागमन और हम

व्यंग्य – बसंतागमन और हम

यूँ तो हमने जीवन के छत्तीस बसंत लल्लुओं की तरह गुजार दिए पर कभी महसूस नहीं हुआ कि हमने बसंत को कभी बसंत की तरह जिया भी हो | कारण सीधा सा हमें यही लगा कि हमारी जन्मकुंडली में उस बेवकूफ ज्योतिषी ने लिख रखा था, ‘’ दाम्पत्य जीवन के लड़खड़ाते सुख के अलावा नंबर दो वाले सारे प्रेम प्रसंग असफल रहेंगे |’’
शायद कारण यही रहा कि जीवन में प्रेमिकाएं तो नहीं आई | आई तो पत्नी , वह भी सावन की घटा की तरह बवंडर मचाने वाली , जिसे हम आज भी ‘’ बाढ़ग्रस्त ‘’ इलाके की तरह झेल रहे हैं |
बसंत ऋतू में कदम रखते ही ठण्ड कुनकुनी और मौसम ब्यूटी पार्लर से सज-धज कर निकली युवती के गालों की तरह आकर्षक गुलाबी हो चला था | चलती पुरवाई गोरी के होठों की छुअन की तरह तन-मन को सहला रही थी | फिर भला इस ‘’ बासंती काल’’ में हमारी दिलफेंक इंसान वाली तबीयत कब तक मुरझाये फूल की तरह रहती | उसमें भी तो बासंती रंगत आना स्वाभाविक था |
  हमने पत्नी से कहा –‘’ सुनो प्रिये बसंत (ऋतु)आ गई |’
वे बोली –‘’ कौन बसंत ?’
‘’अरे ...बसंत भई बसंत |’
‘’दफ्तर की नई क्लर्क ?’’
‘’ नहीं यार |’’
‘’नई किरायेदार पड़ोसन ?’’
‘ अरे नहीं यार |’’
‘ तो दफ्तर में नई महिला चपरासी ?’
‘’ तुम भी अच्छे भले मूड के दौर में दिमाग के कोने में कचरे का ढेर लगाने वाली बात कराती हो |’’
‘’ तो सीधे-सीधे बताते क्यों नहीं | खबर में पात्र का नाम छिपाने वाले संवाददाता की तरह क्यों पेश आ रहे हो ?’’
पत्नी ने भी धाँसू जवाबी प्रश्न किया | ‘’ अरे भई, मैं तो बसंत ऋतु की बात कर रहा हूँ | किसी बाहर वाली ‘ करंट ‘’ की नहीं |’
‘’ वो तो ऋतु है , आज भी आई है, अगले साल भी आएगी मगर अपने आपमें गैदा से गुलाब क्यों बने जा रहे हो ?’’
‘’ मेरा मतलब सालभर तो तुम बिजली और घटा की तरह कड़कती और बरसती हो मुझ पर , कम से कम इस मौसम में गुलाबी कोंपलों की तरह जुबान व मन में नारामिन लाकर मदमस्त प्यार दो मुझे ताकि लगे कि अपना दाम्पत्य जीवन भी कहीं से नीम की पट्टी की तरह कड़वा नहीं है |’’
‘’ तो इतने दिनों तक गिलोय चूर्ण फांक रहे थे क्या ?’’
‘’ तुम तो ज़रा सी बात में तुनक जाती हो ... मेरा कहने का मतलब सालभर न सहीं , कम से कम इस ऋतु को पूरी गुलाबी तबियत से जियें |’’
‘ तो क्या अब तक रेगिस्तान की तरह जी रहे थे ?’’
‘’ अरे नहीं यार ...प्यार में डूबकर जिए |’’
‘’ क्यों ? अभी तक कहाँ डूबे थे , गाँव की तलैया में भैंस की तरह ? और ये तीन बच्चे ऐसे ही आ गए ?’
‘’ अरे बाबा , मैं शक की गुंजाइश से नहीं देख रहा | मैं कहना चाह रहा हूँ कि इतना प्रेम रस पीएं कि हमें लगे , जैसे हमारा दाम्पत्य जीवन एक मिसाल है |’
‘’शादी के दस साल बाद मिसाल बनने की फ़िक्र लगी है ... जाओ उधर और कागज़ पर कलम घसीटकर बसंत में दाम्पत्य प्रेम पर लेख रचना कर मिसाल बनाओ |’
‘’ अरे पगली , तुम जानती नहीं कि यह मानव प्राणी के लिए प्रकृति द्वारा बनाई गई ऋतु है | पढ़ती नहीं किताबों , पत्रिकाओं में कि कवी , लेखाकगन कितने सुहावने प्रतीकों से आदरपूर्वक संबोधन देते है उसे ... और एक तुम बासंती मौसम को चुटकी का मेल समझ रही हो |’
‘’ देखो जी, अभी मेरा सारा ध्यान बच्चों के भविष्य को लेकर केन्द्रित है |’’
‘’ अच्छा बताओ , तुम मुझ पर कब तक ध्यान दोगी ?’
‘’ जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर ब्याहे जाएंगे |’’
‘’ तब तक मैं...?’’
‘’ इंतज़ार करो |’
‘’ तो मरने के काल में तुम मुझे प्यार दोगी?’
‘’ विदाई कल में किसी का दिया प्यार कई जन्म तक याद रहता है ,अगले जन्म में भी मिलन हेतु बेचैन करता है |’’
दूसरे जन्म में तुम्हारा होकर क्या मैं पुन: अपना बंटाधार करवाउंगा ?’’
‘’ और नहीं तो क्या | इसी आते-जाते बसंत की तरह सात जन्म तक |’’
मुस्कराकर पत्नी ने हमें चूम लिया | एक क्षण को लगा कि पत्नी भी हौले-हौले बासंती रंग में आ गई है | मैं सच कहूं , पूरे विश्वास से उसके मूड के बारे में कुछ नहीं कह सकता |अभी वह बासंती मूड में है लेकिन अगले क्षण .............!


    सुनील कुमार ‘’सजल’’ 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

व्यंग्य –सरकारी अस्पताल में नववर्ष

व्यंग्य –सरकारी अस्पताल में नववर्ष

सरकारी अस्पताल में नववर्ष आगमन का जोशो-जूनून है | अस्पताल का प्रतेक कर्मचारी रोगियों को शीघ्र स्वस्थ होने की बधाई नहीं बल्कि अपने सहकर्मी मित्रो को अपने बदनुमा दाग कारनामों में सफल रहने की नववर्ष की बधाई देने की तैयारी में हैं |
अस्पताल की व्यवस्थाएं शराब पीये शराबी की तरह लड़खड़ा रही है | मगर रोगीगण मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं | इसका कारण यह रहा है कि पिछले माह जब लोगो का मुंह खुला था तो अस्पताल का स्टॉप हड़ताल में चला गया था | नतीजा , इस बीच कई रोगियों ने या तो घिसटते हुए दिन काटे या फिर कुछ ने स्वर्ग का रास्ता पकड़ लिया |
हम उस दिन अस्पताल में मौजूद थे | अपने एक सगे सम्बन्धी को इलाज कराने हेतु ले गए थे | इस बीच हमें अस्पताल घूमने का अवसर प्राप्त हुआ और इस अवसर से जो दृश्य देखने को मिले वहकाबिल्र तारीफ़ है | क्योंकि नववर्ष आगमन में चंद घंटे ही तो शेष हैं |
 आईये , सबसे पहले बाह्य रोगी कक्ष में चलें | लम्बी कतार में लगी टेबिल कुर्सी पर डॉक्टर विराजमान हैं | सबके चहरे पर नववर्ष की ख़ुशी अलग ही खिल रही है जैसे कीचड़ में कमल खिलकर मुसकाता है | इस बीच रोगी भी अपना इलाज करवा रहे हैं | चंद चित्र आप भी देखिए|
डॉक्टर रोगी से –‘’ हां क्या हुआ ?’’
रोगी-‘’ डॉक्टर साब , सर में , हाथपांव में दर्द है ‘’ रोगी अपनी पीड़ा बता रहा है | डॉक्टर अपनी सहयोगी डॉ. शर्मा से – ‘’ हां तो मदम आप नववर्ष पर पिकनिक मनाने कहाँ जा रही हैं |’’
मरीज की बात अनसुनी करते हुए डाक्टर साब पर्ची पर कलम चलाते हुए दवा लिख रहे हैं | बातचीत डॉ. शर्मा से जारी है | अंत में –‘’ दवा ले लेना , खा लेना | मरीज आश्चर्य में है , उसे डाक्टर ने न नजर भर देखा , न छूकर | इलाज लिख दिया | पर बेचारा क्या बोले | ज्यादा बोलता है तो क्जिदकी मिलेगी | कारण कियह सरकारी अस्पताल है | प्राइवेट अस्पताल थोड़ी न है जहां फीस वसूल कर घोड़े को पुचकारने के तर्ज पर पुचकारा जाता है
 इसी तरह की कुछ मिलती-जुलती हरकत डॉ. शालिनी , डॉ सुदेश , डॉरीना भी कर रही हैं | डॉक्टरों के बीच ‘ नववर्ष कैसे बेहतर मनाएं ‘ नामक विषय को लेकर गहन चर्चा चल रही है | कुछ सूना – कुछ नहीं सूना के बीच इलाज करने का क्रम भी | दवा कक्ष भी नववर्ष की ख़ुशी में भीगा जा रहा है | कर्मचारी आपसी चर्चा में इतने मशगूल हैं कि दवा देकर आगे मरीज से बात करना उन्हें बुरा लग रहा है |
 एक मरीज दवा मिलने के बाद बोला- ‘’ साब दवाई कौन-कौन से समय पर खाना है ? कम्पाउंडर अपने सहकर्मी से बातचीत करते हुए मरीज बोला- ‘’ दो दिन की दवा है | कुल खुराक में दो का भाग देकर जो भागफल प्राप्त हो उतने में एक समय में जीतनी खुराक आए , खा लेना |’’
‘’ साफ़-साफ़ बताइये न , साब |’’
‘’ अनपढ़ हो का ? साक्षरता के मामले में अपना जिला नंबर वन पर है , इतनी सी बात नहीं समझ सके | नाक कटवाओगे का ?’’
रोगी बुदबुदाता हुआ, बहस किये बगैर आगे बढ़ गया | अभी कुछ और मरीजों को दवा वितरकों के साथ बहस सुनाई दे रही थी |
इस समय पर हम इंजेक्शन कक्ष में थे | तीन नर्से वहां मौजूद थी |
एक- ‘’ और न्यू इयर किस प्रकार सेलिब्रेट करने जा रही हो दीदी ?’’
दूसरी – ‘’ मैं तो गहने खरीदूगीं और पहनूगीं |’
तीसरी- ‘’ मरीज के इंजेक्शन लगाने जा रही नर्स से कहती है –‘’ देख पर्ची पढ़कर ही इंजेक्शन लगा रही है न ? वरना दादा का न्यू इयर की जगह लास्ट इयर हो जाएगा |’
‘’ हां ,हां दीदी .... और इनके बूढ़े शारीर में वैसे भी एक सौ एक प्रकार के मर्ज होगें | अगर दूसरा इंजेक्शन लग भी गया तो उससे कोई दूसरा रोग ठीक हो जाएगा | क्यों दादा , ठीक कहा न ?’’
बूढा देहाती मरीज अकबक होकर उनका मुंह देखता रह जाता है | चर्चा जारी है नववर्ष को लेकर | इंजेक्शन लगनेका काम भी जारी रहता है | लापरवाही भी चालू आहे |
 मलेरिया स्लाइड जांच कक्ष या पैथोलाजी कक्ष में एक टेक्नीशियन अपने साथी को समझा रहा है –‘’ अबे इतना ईमानदार बनाकर कब तक स्लाइडों पर आँख गडाता रहेगा | अगर ऐसा करने बैठा न तो समझ ले | कल तक तेरा काम पूरा नहीं होने वाला | एक काम कर | अलग कर माइक्रोस्कोप | जितने नाम की स्लाइडें आयी है उनके नाम के आगे सबको पीवीटी लिखाकर इतिश्री का काम कर | कल नववर्ष पर ‘’ तरच डेम ‘’ जाना है कि नहीं ? सहकर्मी समझदार है | वह उसकी बात को अच्छी तरह समझ गया | मुस्काता हुआ रजिस्टर में जानकारी फिलअप करने में जुट जाता है |
आंतरिक रोगी कक्ष के मरीज डॉक्टर साब राउंड पर आए तो अपना दर्द बताये | बड़े इन्तजार के बाद डॉक्टर साब कक्ष में पधारते हैं | रोगियों के चहरे खिलते हैं | वे उनसे कुछ कहने की मुद्रा में सावधान होते हैं | पर डॉक्टर साब उन तक पहुँचाने के पहले वार्ड ड्यूटी में तैनात नर्स को हिदायत देने के बाद कहते हैं – मिस शर्मा मैं कान्हा नॅशनल पार्क जा रहा हूँ | कल नववर्ष है इसलिए परसों तक वापस हो सकूंगा |’’ इस बीच वे नर्स को कुछ और समझा कर विदा हो जाते हैं | मरीज उन्हें ताकते रह जाते हैं | अब पूरा वार्ड खुर्राट नर्स के कब्जे में है | उसका रोल मरीजों से किसी आतंकवादी से कम नहीं है | बात –बात पर डांट-फटकार,चिड़चिड़ाहट और ज्यादा हुआ तो गाली भी | ‘’ जी हां यह सरकारी अस्पताल है | यहाँ मुंह बंद कर रहने में भला है | ऐसा भुक्तभोगी मरीज कहते हैं |
इस तरह अलग-अलग वार्ड में अलग-अलग तरीके से नववर्ष की ख़ुशी व्याप्त है |एक मरीज हैं जो ख़ुशी को भूल शारीर की चिंता में .... बिमारी की चिंता में घुले जा रहे हैं |

   सुनील कुमार ‘’सजल’’

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

व्यंग्य- नववर्ष की शुभकामना पार्टी

व्यंग्य- नववर्ष की शुभकामना पार्टी

नववर्ष आने की खुशी अलग होती है | सब एक दूजे को बधाई देते नजर आते हैं | तरह-तरह की शुभकामनाएं | तरह-तरह से शब्दों का संयोजन |
साब, शुभकामनाएं देने में क्या हर्ज है | अब सामने वाले के साथ कितना शुभ होता है वे जाने | दे दो, जैसी चाहो वैसी दे दो | यार , मुंह में जीभ ही तो पटकनी है | आखिर घंटों गप्पबाजी या बहस में भी तो जीभ पटकते हैं | दो शब्दों के बोल से प्रेम उमड़े तो क्या बुराई | वैसे शुभकामना ख़ास पर्व पर देने के लिए ही नहीं होती | बल्कि अपना उल्लू सीधा करना हो तो भी दी जा सकती है | जो न पते , उसे उसके कार्य के प्रति शुभकामना देकर पटाओ | जो आकडे उसे , शुभकामना देकर झुकाओ |
सेठ रामदयाल किराना वाले अपने ग्राहकों को प्रत्येक बड़े पर्व पर शुभकामना पत्र भेजकर पटाए रखते हैं | ताकि महँगा बेचकर ग्राहक न बिदके |
अपन तो मोबाइल से एस.एम्.एस. भेजते हैं | शुभकामना देने का ये अपना अर्थशास्त्र है |सस्ते में ज्यादा लोगो को सन्देश भेजते हैं |मंहगाई का दौर है | शुभकामना पात्र वै९से भी महंगे हैं | एक कार्ड के खर्च पर दर्जन भर से ज्यादा लोगो को निपटाओ | ठीक हैं न , यह अपना बचत का फंदा |
साब, अबकी बार अपने कंजूस सरपंच जी बेहद खुश हैं | यूं तो वे कंजूस के बाप हैं | नेतागिरी के पूरे गुण हैं उनमें |यानी दूसरों की जेब का खाओ , अपनी को हाथ न लगाओ |इसी नीति के आधार पर वे राजनीति करते हैं | पर इस बार नामालूम क्यों उनमें इतनी दिलेरी आ गयी | कल कह रहे थे –‘’ मास्टरों , अबके नववर्ष पर हम आपको पार्टी देंगे |’’
उनका ये एलान हमें शंका से भर दिया | बात – बात पर स्कूल में आकर सरपंची झाड़ने वाला इस बार अपनी जेब ढीली करने को कैसे सोच लिया ? हम लोगों के मन में उपजा खतरनाक प्रश्न था | कहीं कोई चाल तो नहीं चल रहा ? या फिर मनारेगा के कार्य में मुरदों के नाम राशि डकार लिया हो | और उस राशि से हमें खिलाकर अपने पाप का क्रियाकर्म करना चाह रहा हो | वैसे भी उसने जो गाँव में खेल-मैदान तैयार करवाया है |उसकी पोल ज़रा सी बरसात खोल देती है |
 ये भी हो सकता है , इन दिनों उनके घपलों की खबर हर जुबान पर है | पेंशन योजना , तालाब निर्माण , सड़क निर्माण व भवन निर्माण में जो वारा न्यारा किया है | वह तो कई अखबारों में छाप चुका है | हो सकता ग्राम के आंतरिक विरोध से बचने के लिए हम जैसे मास्टर यानी निरीह प्राणी बनाम बुद्धिजीवीयों का समर्थन चाह रहे हों | ताकि हम उनका नमक खाकर नमक हलाल बने | उनकी जय-जयकार करते नजर आयें | काहे कि आज भी गाँव में शिक्षकों का सम्मान पचास परसेंट तो बरकरार है ही |
तो साब , नववर्ष का प्रथम दिवस निकट है | हमारे स्कूल के सभी टीचर्स खुश हैं | इस बार सरपंच मेहरबान है | वे सुबह संस्था में आए थे – ‘’ यारों इस बार पार्टी अच्छी होगी | इसलिए रूपरेखा आप लोग तैयार करो | खर्च हम करेंगे |’’
‘’ पार्टी सिर्फ शिक्षकों के लिए ...या फिर बच्चे भी उसमें ...| ‘’ शिक्षक मित्र ने कहा |
‘’ बच्चों को... |’’ वे अटकते हुए बोले | फिर बोले –‘’ चलो कहते हो तो एक-एक रुपये वाली सोंनपपड़ी उन्हें भी बंटवा देंगे |’’
इस बार उनका स्वर एहसान में डूब कर पूर्ण गर्व से निकला था | थोड़ी देर चुप्पी | फिर इधर –उधर की बात | इसी बीच सरपंच बोले- ‘’ कही , खाने – पीने में क्या आयटम रखे जाएँ |’’
बीच में एक शिक्षक ने होटल की मंहगी मिठाई के नाम गिनाये तो वे हँसे |बोले-‘’ क्या मिठाई पर चीते की तरह टूटे जा रहे हो | कुछ अच्छा सुझाव | ताकि पार्टी रंगीन हो जाए |’’
‘’ पार्टी रंगीन बनाने के उपाय तो शर्मा सर ही बता सकते हैं | हमने कहा |
‘’ हम क्या बताएं | अपन ठहरे छोटी तनख्वाह बनाम औकात वाले आदमी |उसी के अन्दर बता सकते हैं |’’ शर्मा जी बोले |
‘’ यार आप अपनी औकात नहीं , बल्कि हमारी देखकर बताओ |’’ सरपंचजी बीच में टप से बोले | इसी बीच शर्मा जी क्या सूझा | बोल पड़े ‘’ खीर पूरी |’’
‘’ यार पंडित तुम मर कर भी नहीं सुधारे | ज़माना बीत गया खीर-पूरी दही-पेड़ा खाते | फिर भी नहीं अघाये |’’ सरपंच जी ने उनकी बात काटकर मुंह बनाते हुए कहा |
‘’ अच्छा , सरपंचजी , आप ही सुझाएँ |’’ अन्य शिक्षक ने कहा |
‘’ ‘’यार हमारी इच्छा है | दारू-मुर्गा की पार्टी रख ली जाए | देशी मुर्गे मंगवाए हैं हमने | उलटे पंख वाले |’’ सरपंच जी ने मुर्गे की विशेषता के साथ अपना प्रस्ताव रखा |
हम साब अकबक होकर एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे | यह क्या , आए दिन स्कूल में नशे के खिलाफ सरपंच भाषण झाड़ता है |स्कूल में तम्बाकू – सिगरेट का नशा लेना दूभर हो गया है | पके फोड़े की चिलकन – सी तलब को कलेजे में दबाए रखना पड़ता है स्कूल में | पिछले बरस दारू पीकर स्कूल में आए यादव मास्साब की ऊपर शिकायत कर इसी सरपंच ने सस्पेण्ड करवाया था | और आज खुद हम लोगों से...| पट्ठा कहीं किसी षडयंत्र का खलनायक तो नहीं बन रहा है ‘’|
‘’ अरे भाई घबराओ नहीं |’ सरपंच जी ने शायद हमारे चेहरों को पढ़ लिया था | मुसकाते हुए कह रहे थे –‘’ हम किसी से शिकायत नहीं करेंगे | न गाँव वालों को हवा लगाने देंगे | जो भी होगा गुपचुप होगा | नववर्ष में यह सब चलता है | इससे दिमागी टेंशन व आपसी बुराईयाँ दूर होती हैं | नौकरी के समय नौकरी , दोस्ती के समय दोस्ती भली लगाती है तो क्यों न सारे ग़मों को भूलकर ऐश करें |’’
साब जो होगा देखा जाएगा | और जो होता है भले के लिए होता है के दर्शन के साथ हमने सरपंच जी के हाँ में हाँ मिला दी है |
 अब देखते आज नववर्ष का प्रथम दिवस है | सरपंच जी की शुभकामना पार्टी में कितना ऐश कर पाते हैं | फिलहाल ख़ुशी का माहौल है |

    सुनील कुमार ‘’सजल’’ 

रविवार, 13 दिसंबर 2015

व्यंग्य – मुट्ठी गरम करने का मौसम

व्यंग्य – मुट्ठी गरम करने का मौसम


साल बीतने को आया | यानि दिसम्बर आ गया | कडाके की सरदी वाले दिन | पानी जमा देने वाली सरदी | कांपते व सूखे में धरती से दरार मारते हाथ-पांव | ‘’ ग्लोबल वार्मिंग ‘ के ताने-बाने के बीच भी धूप में जैसे गरमाहट ही नहीं |
उन्होंने भी कैलेण्डर में नवम्बर का पन्ना पलटा | सीधे दिसम्बर में आ गए | वैसे भी सरकारी कर्मचारी माह की अंतिम तारीख की बैचैनी के बाद नए माह की पहली तारीख का दर्शन करना नहीं भूलते | दिसंबर के पन्ने पर झांकते हुए उन्होंने हिसाब लगाया | बस हफ्ता दिन बाद वे भी तिरेपन के होने जा रहे हैं | तन-मन भी तिरेपन की गवाही दे रहा है | और वे वैसे भी सरकारी कर्मचारी हैं | साथ के होने तक बाकायदा मुनीम की तरह हिसाब लगाते रहते हैं | नौकरी के कितने साल शेष हैं |
उनके बुजुर्गों के मुख से ‘ सत्य नारायण की कथा’ की तरह सुने संवाद पर वे चर्चा करते हुए बताते हैं | वे जब इसी दिसम्बर में पैदा हुए थे | तब भी ऐसी ही कड़कडाती सरदी थी | हाथ पांव गले जाते थे | उस जमाने में कहाँ थे आधुनिक समय के ए.सी.  व्यवस्था युक्त सरकारी या प्राइवेट हास्पीटल | बस ऐसई थे | खपरैल वाले आधी खुली – टूटी खिड़की वाले | बस ज्यादा हुआ तो छत पर पंखे लटके रहते थे | उनकी स्पीड भी बीमार आदमी की तरह होती थी |
कड़क सरदी थी उनके पैदा होने के समय | घर में पैदा हुए थे | वो तो आज की माताएं प्रसव पीड़ा से ऐसी भागती हैं जैसे नेवले को देखकर सांप | जब तक पेट पर छुरा नहीं चलवाती , प्रसव-पीड़ा उपरांत शिशु-जन्म का सुख नहीं उठा पाती |
 तब की माताएं पूरी तरह लक्ष्मीबाई की तरह साहसी व सहनशील थी | चाहे जो भी हो पर वे प्रसव हेतु अस्पताल नहीं जाएंगी | भले- ही तड़प-तड़प कर, दम तोड़ना पड़े | पर घर का प्रसव कक्ष नहीं छोडेगीं | कहती थी – ‘ अस्पताल का मुख बैरी लोग देखते हैं |’’
वे रात की अच्छी खासी पड़ती ठण्ड में पैदा हुए | घर के लोग घबरा रहे थे | कैसे भी, शिशु के बदन में गरमी बनाए रखो | वरना न्युमोनिया का खतरा हो सकता है |
 वे गरम कपड़ों से ढके थे | बदन में मां के आगोश के साथ गरम कपड़ों से उनके बदन में गरमाहट बनी हुई थी | फिर भी घर की महिलायें उनकी मुट्ठी छू कर देखती , कहीं ठंडी तो नहीं हो रही | काहे की ठंड ही ऎसी थी | आज वे सोच रहे थे | सात साल शेष हैं , सेवानिवृति के लिए | साली , ठंड कैसे भी पड़े | उनकी मुट्ठी ठंडी नहीं पड़ सकती | सरकारी नौकरी में आने का यही फ़ायदा साब! अन्नाजी भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन चलायें या रामदेव या केजरीवाल |सेवाकाल तक मुट्ठी ठंडी होने की संभावना नहीं रहती गरम ही रहती है |हाथ मलने की जरुरत नहीं पड़ती | यदि विभाग कुबेर योजनाओं वाले मिल जाएं तो क्या कहने |
अभी वे सात साल तक टेंशन फ्री हैं | पत्नी ने उनसे कहा परसों ही | ‘ए जी, दस्ताने पहनाकर दफ्तर जाया करो | देख रहे हो कितनी ठंड हैं | हाथ पैर ठंडे हुए जा रहे हैं |
‘’ ये सब तुम्हें नसीब हो |’ वे उलटा मुंह कर बोले थे |
‘’ का कह रहे हो | रात भर दमा के मरीज की तरह खांसते खखारते रहते हो | अँगुलियों से ही शीत पहुंचती हैं | बदन में पत्नी अपनी जिद पर आती हुई बोली थी |
 ‘’ पगली हो का | दस्ताने पहन के हम दफ्तर में काम कैसे करेंगे | वे कुछ चिडचिडे अंदाज में बोले | फिर कुछ शांत होकर बोले – ‘’ काम हो हाथों में वैसे भी गरमी बनी रहती है |
पत्नी उतनी बुद्धिजीवी नहीं है | जो उनका सरकारी हिने का आशय समझ सके | आखिर गृहलक्ष्मी ठहरी | घर के दायित्वों से ज्यादा उसकी सोच ज्यादा खनक नहीं सकती | बाहर की समझ पैदा करने के लिए बुद्धि को घुटने से मस्तिष्क में लाना पड़ता है |
 अब की पत्नी पुन: दास्ताने धारण करवाने की जिद पर आयी | उन्होंने अफसरी अंदाज में डपट दिया | वह भुनभुना कर रह गयी |
 इस शीतकाल में कुछ मुहावरों के मायने हर बात से जुड़े रहते हैं | उनका अर्थ लोग समझते नहीं | अब देखो न हाथ से हाथ रगडो तो लोग समझते हैं बदन में गरमाहट पैदा करने के लिए कर रहे हैं | असली मायने में बात यह है होती है कि कड़की के दौर से गुजर रहे होते हैं |
 हाँ इत्ता जरुर है कि बिना दस्ताने के रहने से इज्जत बाख जाती है | लोग समझते हैं मुट्ठी ठंडी नहीं है अमुक की |वरना यदि दस्ताने न भी होते तो ठंडी होती मुट्ठी में गरमाहट लाने के लिए जेब में हाथ डालकर रखता |
इधर साब सरदी कम होने का नाम नहीं ले रही थी | दिनोदिन और बढाती जा रही थी | अखबारों व चैनलों में मौसम की भविष्यवाणियाँ कलेगे को कम्पकपायी दे रही थी | भविष्यवाणी करने में मौसम विभाग बड़ा बदमाश होता है | दसंबर-जनवरी के कडाके की सरदी वाले दिन होते हैं | बिना माथा पचाए हवाओं की स्थिति भांप कर कह देता है ‘| उत्तरी हवाओं के चलने से अभी कुछ दिन कडाके की सरदी पड़ेगी | और यदि अचानक बादल छाने के वक्त बयान होता है –‘’ ‘पश्चिमी विक्षोभ के कारण या उत्तरी हवाओं के कमजोर होने के कारण तापमान में वृद्धि दर्ज की गयी है | ज्यादा बादल दिखे तो तापमान वृद्धि के कारण | बादल आ रहे हैं | फलां समुद्री क्षेत्र में तूफ़ान की आशंका से कम दाब का क्षेत्र उत्पन्न हो गया है | इसलिए क्षेत्र में गरज के साथ छीटें पड़ने की संभावना है |
 वे कहते हैं कि यार, ऐसे बयान देने से क्या जाता है | मौसम कोई बंधुआ मजदूर थोड़ी न है जो इशारों पर चले |’ मौसम की भविष्यवाणी में किसी ज्योतिष की तरह ‘ संभावनाओं को महत्त्व देकर पल्ला झाड लेते हैं | यार वे भी सरकारी कर्मचारी हैं | कोई प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी थोड़ी न हैं | जो हर तथ्य को सटीकता से स्पष्ट कर अपनी प्रोफेशनल रेटिंग बढायें|
तो साब , मौसम कि भविष्यवाणी का असर सरकार को भी हुआ | सरकारी आदेश जारी हुए , गरीब गरबों व राहगीरों  के लिए अलाव की व्यवस्था की जाए |
 सरकारी क्षेत्र में व्यवस्था नामक शब्द का बड़ा महत्त्व है | जब भी व्यवस्था के आदेश जारी होते है | अव्यवस्था के बारे में पहले सोचा जाता है | अब देखिये अलाव की व्यवस्था के पीछे खडी एक अव्यवस्था के बारे में सोचा गया | जिसे आंकड़े बाजी की जादूगरी कह सकते हैं | इस भाषा को सरकारी कर्मचारी अच्छी तरह समझता है अव्यस्था व्यवस्था का कोडवर्ड है | जिसे लोकतंत्र की भाषा में कमीशन के नाम से जाना जाता है | व्यवस्थापक विभाग उसी काम में रूचि दिखाता है | जहां अव्यस्था की गुंजाइश हो | वरना कोई माथा व हाथ पांव क्यों दुखाने चला |
 साब , आपको बता दें | गरीब – गुरबों की तरह सरकारी महकमे के पास भी मुट्ठी होती है | अगर वाही ठंडी हो गयी तो वे जेब में हाथ डालकर बैठ जायेंगे | फिर कौन करेगा व्यवस्था | इसलिए भाई साब पहले उनकी मुट्ठी गरम होना आवश्यक है |तभी न वे पूरे जोश व गरमाहट के साथ आपके हित के बारे में सोचेंगे |
इधर शहर से दूर बसे शहीद पार्क में प्रेमी जोड़ो की आवाजाही कम हो गयी है | शायद सर्द हवाओं के चलने के कारण | एक तो मौसम ठंडा | और पार्क कि ठंडक | अब कोई बर्फ की मानिंद ढलकर स्टेचू थोड़ी न बनाना चाहेगा |
मोबाइल पर एक प्रेमिका ने प्रेमी से कहा- ‘’सुनो , धर्मेश , अब हम पार्क नहीं जाएंगे | बल्कि काफी हाउस चलेंगे |’’
‘’ क्यों ?’
‘ ऎसी ठंड में वहां क्या हु..हु.. कर समय बिताएंगे ?’’
इसी बीच प्रेमी ने छेड़छाड़ भरी बातें की|प्रेमिका शरमाई बोली- ‘’ फालतू बात न करो | मैंने जो कहा | उस पर हाँ कहो |’’
प्रेमी ने हाँ तो कर दी | पर बेचारे की धड़कन बढ़ रही थी | एक तो बेरोजगारी और ऊपर से काफी हाउस का खर्च | आधुनिक प्यार ऐसे ही चलास्ता है | गरीबी गुजारा में प्यार कोमा की अवस्था से कम नहीं होता |
प्रेमी परेशान है | सच भी है | काफी हाउस में बैठकर प्यार की मीठी बातों के बीच केवल कॉफी सुड़कने से काम चलता नहीं | देशी – विदेशी डिश भी होनी चाहिए | बहानेबाजी की तो बेवफाई का इल्जाम सर पर आता है | इस आधुनिक दौर के प्रेम मंच पर प्रेमिका सत्यवती तो नहीं है कि एक तो पकड़ा तो अच्छे बुरे से उसी के संग निभ जाए | उसके पास भी राजनेताओं की तरह पार्टी बदलने के आप्शन है |
खैर छोडिये , फालतू की बातें हैं | पुन: सरदी की बातें करें | मौसम ठंडा है तो क्या हुआ | बिना हड़ताल या काली पट्टी बांधे सरकार ने हम सब कर्मचारियों के लिए मंहगाई भात्ते की रुकी क़िस्त घोषित कर दिया है | अब देखते हैं , मंहगाई के इस शीत लहर वाले दिनों में भत्ते की गरमाहट कितने दिन टिक पाती है |

         सुनील कुमार ‘’सजल’’

रविवार, 6 दिसंबर 2015

व्यंग्य- मौसम का दौर

   
व्यंग्य- मौसम का दौर

इस वर्ष मौसम का अजीब दौर चल रहा है |उनकी समझ के बाहर | वे परेशान है |अभी तक शरद का असर न के बराबर |ऐसा वे महसूस कर रहे हैं |शरद का मौसम और शरद का अता – पता नहीं |दिन गरमी , रात में मामूली ठंडक |वे बोले –‘’का बात है भैया इस बार ठण्ड नहीं पड रही | ऐसे ही मौसम में जीना पडेगा का |’’
‘’ का करना है मौसम से कुछ भी रहे |’’
‘’यार मौसम कोई भी रहे से का मतलब |ठण्ड पड़ना चाहिए |अगर ऐसा नहीं हुआ तो ये मौसम की बेईमानी कहाएगी |हेल्दी सीजन कैसे मानेंगे | परम्परा टूट जाएगी मौसम की |भारतीय संस्कृति में  टूटती पम्पराओ की तरह |’’
वे परेशान हैं हैं ठण्ड न पड़ने से |ऐसा भी नहीं है कि वे कोई ऊनी वस्त्रो के व्यापारी हैं |जो माल स्टॉक होने का भय बना रहे |और अगले सीजन के लिए मनी प्राब्लम कड़ी हो जाए |
  इन दिनों नगर  में आने वाले ऊनी कपड़ों के  फेरी वाले भी लगभग गधे कि सींग की तरह गायब है |एक फेरी वाला जो अक्सर सीजन के हिसाब से माल बेचता है |उससे हमने पूछा-‘’इस बार धंधा बदल दिया क्या ? ऊनी वस्त्र कि बजाय साडी बेच रहे हो |
‘’ मौसम ही ऐसा है साब कि साड़ियाँ ही बिकेगीं |उन-स्वेटर के मौसम में लोग पंखे चालू करके सो रहे हैं |ठंडा – आइसक्रीम का मजा ले रहे हैं |इस शरद कहे जाने वाले मौसम में |’’ उसने कहा |
   वे कहते हैं |अगर शीत ऋतू ने अपना जलवा नहीं दिखाया तो क्या होगा |अगले सीजन में गरमी और भी तेज पड़ेगी |हम तो पसीना बहाते हुए और पोंछते –पोंछते मर जायेंगे |
  वे सुबह घूमने के लिए इस मौसम का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं |बुढाती जिन्दगीं में सुबह –सुबह घूमने के बहाने चार दोस्त भी मिल जाते हैं |इसी बहाने अपनी जिन्दगीं के चार किस्से भी बाँट लेते हैं |बहु-बेटे के अलावा पास-पड़ोसी के प्रति मन में जगती कुधन भी बाँट लेते हैं |मन हल्का हो जाता हैं सुबह की ताजा हवा और मन की कुधन को उगल देने से |
 इस बार सुबह घूमने वालों ज्यादा रूचि भी दिखाई नहीं दे रही है |
वे पूंछ रहे हैं पडौसियों से –‘’ इस बार पहाड़ों में बर्फ नहीं पड़ी क्या |अमेरिका में तो खूब बर्फीली चादर फैली पड़ी है |लोगों का जीवन दूभर हो गया है | अपने यहाँ तो उत्तरी हवाओं का अभी तक पता नहीं है कि ठण्ड का असर बढे| मौसम विभाग है कि नेताओं की तरह ठण्ड पड़ने के आसार का बस आश्वासन पर आश्वासन दिए जा रहा है |
 अखबार वाले भी खूब लिख रहे हैं मौसम के रुख पर |कई लेखकों ने तो इस गरमाहट के बीच भी सर्दी से बचाव के इतने लेख लिख मारे कि उन्हें पढ़ कर  गरमी में भी ठंडी का एहसास होने लगा है |इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं के साहित्यिक पृष्ठों में सर्दी को लेकर  ,कविताएं , व्यंग्य ,कहानी व निबंधों ,संस्मरणों, की बर्फीली चादर जमीं है | मगर वास्तविक जगत में ..... धूल, गरमाहट, तेज धूप | एक लेखक महोदय तो ‘’ शरद तू क्यों नहीं आ रही’’ विषय पर  दो दर्जन प्रेम कवितायेँ लिखकर अपने को सच्चा देशप्रेमी की तरह मौसमी कविता प्रेमी साबित कर दिया |
 इधर स्कूल में मास्साब भी कक्षा में ग्लोबल वार्मिंग व शीत के मौसम में आये बदलाव को लेकर धकापेल लेक्चर दे रहे हैं |टाइम पास प्रवचन की तरह |छात्र भी सत्यनारायण की कथा में मौजूद प्राचीन कहानी को पंडितजी के  मुख से सुनते भक्तों की तरह  ढो रहे हैं |
 दफ्तर के कामचोर कर्मचारियों में अलग खलबली मची है |धूप में बैठकर गप्प मारते हुए काम टालने के सारे बहाने धरे पड़े हैं | अभी ठण्ड का कोई बहाना अपन जुगत नहीं बना पा रहा |बेचारे परेशान हैं |
  बदलते मौसम को लेकर यूँ तो शासकीय ,गैर शासकीय सम्मलेन हो रहे हैं | होते रहेंगे |बहानेबाजियाँ बयानबाजियां चलती रहेंगीं |पर मौसम क्यों नाराज है इसका तो पता तो लगाना पडेगा |वरना ......अभी तो मौसम का भुगत ही रहें हैं |,

         सुनील कुमार ‘’ सजल’’ 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

व्यंग्य-मन की भड़ास निकालिए जरूर

   
व्यंग्य-मन की भड़ास  निकालिए जरूर


कुछ दिन पूर्व मैंने एक शोध समाचार पढ़ा कि आदमी को अपने मन में उपजी भड़ास को अवश्य निकालना चाहिए | इससे दिमाग का तनाव कम होता है और तनाव से जुडी बीमारियाँ भी |शोधकर्ता ने भड़ास निकालने के उपाय भी सुझाए जैसे घर में तोड़फोड़ करें |
  वैसे भड़ास निकालने के लिए लोगों के पास अपने-अपने तरीके होते हैं , जैसे राजनीति के लोग यानी नेता विधायक व सांसद एक दूसरे को जलील कर मन कि भड़ास निकालते हैं | इसके तहत वे एक-दूसरे को ह्त्या, बलात्कार, हवाला अपहरण जैसे कांडों में फंसाकर राहत कि सांस लेते हैं |
मेरे पड़ोस के मित्र दल-बदल के मामलों में कमजोर हैं इसलिए मन की भड़ास निकालने के लिए व्यंग्य कवितायें लिखते  हैं |कहते हैं व्यंग्य कि मार तलवार या घूंसे की मार से कष्टदायी होती है | घायल आदमी उफ़ तक नहीं कर पाता |
पिछले माह राह चलते हमारी मुलाक़ात हमारे इलाके के डाकिया महोदय से हो गयी | हमें डाक पकडाते हुए वह बोला –‘’ हाँ  तो मास्टर जी, चाय-पानी का खर्चा निकालो | कई दिन ही गए आपने हमारे लिए कुछ नहीं सोचा | हमने ताल मटोल करने का प्रयास किया |’’ अभी हमारे पास चिल्लर नहीं है | बाद में आपको संतुष्ट कर देंगे |’’
‘’ आपको कितने रुपये की  चिल्लर चाहिए | हम देते हैं |’’ फिर भी हमने उनकी बात को काटने का प्रयास किया तो वह  अपनी भड़ास हमसे यूँ निकाल रहा है कि सप्ताह में चार- पांच डाक आती थी, आज महीना भर से हमारे हाथ नहीं लगी है |
फारेस्ट विभाग में कार्यरत वर्मा जी जब पौधारोपण योजना के तहत रेंजर साहब ने उन्हें कमीशन नहीं दिया तो वे अपने अन्दर कि भड़ास उगलते हुए बोले –‘ देखता हूँ कैसे पौधे पनपते हैं , कैसे इनकी योजना सफल होती है | दर्जन भर गाय-बकरियों से सारे पौधे न चारा दिए तो मेरा नाम भी धूमकेतु वर्मा नहीं |’’ उन्होंने अपनी सफ़ेद पद चुकी गुच्छेदार मूंछ पर हाथ फेरते हुए कहा |
प्रकृति भी अपनी भड़ास निकालती हैं उसके साथ छेड़छाड़ कि जाए तो | कभी कडाके की सर्दी ऐसी पड़ती है कि लोग गरम कपड़ो से लादे होने के बावजूद कंपकपाते रहते हैं |वहीँ गरमी भी पिछले कई सालों के रिकार्ड को ध्वस्त कराती नजर आती है , और बरसात ? सूखा |
  जब जबरदस्त गरमी का कहर होता है तब बिजली विभाग वाले भी अन्दर की भड़ास प्रकृति के साथ उगलते हुए कटौती प्लान का चिट्ठा जनता के सामने पटकते हुए कहते- ‘’ बेटा खूब बिजली चोरी करते हो , बिल जमा करने से मुंह चुराते हो तो लो , अब हमारा भी डंडा कम प्रहार वाला नहीं होता | तुम दाल-दाल तो हम पात-पात |
इस तरह भड़ास निकालने के सब के पास अपने- अपने तरीके होते हैं | आप अपने अन्दर कि भडास किस प्रकार निकालते है यह तो मैं नहीं जानता पर जब भी मन में भड़ास कुलबुलाये उसे अवश्य निकालिए वरना क्या होगा , अपन नहीं जानते |

   सुनील कुमार ‘’ सजल’’   

रविवार, 15 नवंबर 2015

व्यंग्य – शीत ऋतु के तेवर


 व्यंग्य – शीत ऋतु  के तेवर



शरद ऋतु के आते ही मोहल्ले में प्रात:कालीन भ्रमण का उत्सव – सा आ जाता है | प्रात:काल घूमने वालों में कुछ शौकिया तो कुछ मन मसोसकर खांसते – खखारते मजबूरी वश घूमने जाने वाले ही होते हैं | कारण कि किसी तरह तन को ठीक – ठाक रखना है तो रजाई को फेंक कर उठाना पडेगा , वरना बीमारियाँ उन्हें ओढ़ लेगी |
इस तरह के घूमने वालों में बच्चे – जवान ज्यादा होते हैं | बूढों का वर्ग भी होता है | उनका ध्यान मौसम की प्रतिक्रया की बजाय दूसरों के आँगन - बगीचे में लगे फल-फूल पर ज्यादा होता है |
 वैसे यही मौसम होता है जब लोग आठ माह अन्य ऋतुओं से संघर्ष करने हेतु खूब खाते और बदन बनाते हैं | आयुर्वेद ने भी इस ऋतु को खाने पचाने वाली ऋतू कहा है | परसों पड़ोस के सयाने दादा कहा रहे थे –‘’ खूब खाओ , मौज उडाओ | बादाम मेवा ,खोआ , घी दूध सब कुछ पचाव | अभी जवान हो अभी खाकर हड्डी मजबूत नहीं करोगे तो क्या बुढापे में करोगे |
हमने कहा- ‘’ दादा इस महंगाई में क्या हड्डी मजबूत करें | खान-पान इतना महँगा हो गया है कि जवानी भी समय से पूर्व बुढापे में तब्दील होती नजर आ रही है |’
वे हंसते हुए कहने लगे –‘’ और हम बताये थे कि अमुक पार्टी को वोट मत दो |’’ हम समझ गए दादा का मंतव्य क्या है | पर फालतू बहस कौन करे | सो हम चुप रहे |
बरसात से क्या खोया क्या पाया के आंकलन के पश्चात सरकार व उनसे जुड़े लोग भी राहत कार्य के नाम खाने पचाने का मौसम बनाते हैं | फिर नए राहत कार्य खुलते हैं | गरीब मजदूरों की मजदूरी या फर्जी मस्टर रोल के सहारे नए-नए जुगाड़ ढूंढें जाते हैं | इस तरह यह ऋतु राजनैतिक हलकों के लिए खाने पचाने की बन जाती है |
  परसों वे बता रहे थे –‘’ सत्तापक्ष में शीत युद्ध चल रहा है |’
हमने कहा- ‘’ क्या ऋतु का असर सत्तासीन सरकार पर भिऊ पड़ता है |’
वे बोले –‘’ क्यों नहीं  | दरअसल कुर्सी पाने पाने  के लिए कुछ विधायाकगण माहौल  गरम कर रहें थे | वे मंत्री बनाना चाह रहे थे मगर सत्तासीन मुखिया उन्हें दबाने के लिए शीत उपक्रम अपना रहे थे | इसलिए उठा-पटक शुरू हो गयी और बेमौसम बादलों के ‘’ बागी’’ बरसने की तैयारी में लग गए |
‘’ वे क्या बादलों की तरह नहीं गल रहे  हैं |’’
‘’ गलेंगे कैसे नहीं | मुखिया जी ‘’ शीत प्रकोप ‘’ बढाने का उपाय कर रहे हैं | मगर आगे देखो क्या होता है |’’
 तभी हमने अंदाजा लगाया | शीत का महत्त्व सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से नहीं राजनैतिक प्रशासनिक दृष्टि से भी होता है |
 सरकारी असपतालों में पहुँचाने वाले मरीजों की संख्या कम होती जाती है | जिसका फ़ायदा वहां का ‘’ स्टॉफ ‘’ उठाता है | दवा मरीजों से बचाकर सीधे ‘’ मार्किट सफ्लाई’’ कर जेब गरम कर लेता है आखिर ठण्ड से बचने के लिए गरमी यानी खाने पीने की व्यवस्था  तो आवश्यक है न |
इसी तरह दफ्तरों में जनता के अधिकाँश प्रकरण ‘’ ठन्डे बसते ‘ में बंद होने के कारण ‘’ लेट लतीफी ‘’ की रजाई ओढ़कर दब जाते हैं | बाबू- अधिकारी लोग कुनकुनी धुप का आंनंद उठाते हुए यूँ कहा देते हैं –‘’ आज तो शीत का जबरदस्त प्रकोप है | आज परेशान न करो |’’
‘’ अरे बाबूजी चाय वगैरह या काफी ग्रहण कर काम निपटा दो |’’
‘’ इत्ते से तो शारीर में झुनझुनी नहीं चढ़ेगी यार | अगर काम जल्दी कराना चाहते हो तो कुछ ‘’ गरम मसाला’’ के साथ बोतल छाप ‘’ काफी ‘’ की व्यवस्था करो तो सोचें |’’
अब आवेदक की क्षमता पर निर्भर करता है कि बाबू और अधिकारियों को शीत से उबारे या कार्य को ठंडा पडा रहने दे |
 वह मौसम उनके लिए महत्त्व रखता है | जो बेचारे प्रेम के मारे होते हैं | ‘’ रात भर करवट बदलते हुए पहाड़ी रात काटकर सुबह प्रेमी , प्रेमिका का ‘’ प्रभुदर्शन’ अंदाज में दर्शन हेतु परत: कालीन भ्रमण का बहाना ढूंढ निकालते हैं | और कुछ तो मौक़ा पाकर अपनी चोंच भी मिला लेते हैं |
इधर मैं कुछ दिनों से परेशान हूँ | घर में चलते स्वेटर बुनाई कार्यक्रम से मेरी जेब ठंडी होती नजर आ रही है | पत्नी के नित्य नए किस्मों की उन खरीदी से मैं बेमौसम पसीना-पसीना हुआ जाता हूँ |
रोक लगाने पर जवाब मिलता है ‘’ पिछले साल की बुनी स्वेटर अब तो यूँ ही लगती है जैसे गधे  के बाल झड गए हों और पहनकर तुम निकलते तो मुझे बड़ी शर्म आती है | मोहल्ले में इमेज का सवालक है सबके घरों नई स्वेटर बुनी जा रही हैं तो अपना घर अछूता क्यों रहे |
अत: हर क्षेत्र के अनुभव ग्रहण करने के पश्चात मैं दावे के साथ कहा सकता हूँ ‘’ शीत ऋतु’ तेवर दिखाने में किसी बोल्ड सीन देने वाली हिरोइन की तरह भूमिका निभाती है | आपकी क्या राय है अवगत कराईयेगा .........|

           सुनील कुमार ‘सजल’

शनिवार, 14 नवंबर 2015

एक बकवास व्यंग्य – सलाह


 एक बकवास व्यंग्य – सलाह

हमारे पड़ोस के मस्तराम जी हमेशा दारू के नशे में मस्त रहते हैं | मगर मजाल है कि वे बहक जाएं | कभी किसी को अनाप -शनाप नहीं बोलते | छोटे –बड़े सभी उनके लिए आदर के पात्र हैं | वैसे वे एक अच्छे सलाहकार के रूप में पहचाने जाते हैं |मगर चंद जानकार लोंगो के बीच में | नादान  पड़ोसी उनका मजाक उड़ाने से नहीं चूकते | वे कहते हैं –‘’ शराबी के मुख से क्या निकलेगी शराब की बदबू |’’
पर ऎसी बात नहीं है , मस्तराम जी दीन- दुखियों की भी खबर रहते हैं | कोई पूछ ले उनसे , कहाँ घोटाला हुआ और सरकार का अगला रुख क्या होगा | मस्त्रक्म जी हाजिर जवाब मिलेंगे |
एक शाम मस्तराम के पास सलाह लेने पहुंचे बबुआ ने उनसे कहा-‘’ कक्का हम और कब तक बाप की छाती पर हाथी बनाकर बैठे रहेंगे | कोई नेक सलाह दो तो रोजगार वगैरह का आसरा बने |’
मस्तराम जी दारू की तीखी डकार लेते हुए बोले-‘ हमारे दिमाग में तुम्हारे लिए बेहतरीन रोजगार का फार्मूला है | कहो करोगे न |’
‘’ अगर आपकी सलाह है तो हम जरूर करेंगे कक्का |’ बबुआ ने हाथ जोड़कर कहा |
‘’देखो अगर तुमने हमारी सलाह मानकर रोजगार अपनाया , तो समझे तुम भी अरबपतियों की लिस्ट में छपे नजर आओगे |’’
‘’ कक्का हमें इतना बड़ा आदमी नहीं बनाना है | हम तो चाहते हैं पेट भर रोटी मिल जाए और घर-गृहस्थी बस जाए | इसके बाद अगर बचत होगी तो कुछ और सोचेंगे |’
‘’हाँ तो ठीक .... एक सलाह काम करो | शरमाना नहीं... हम जो रोजगार बता रहे हैं उसे कृते है | बात कान खोलकर सुन लो ... धंधे में अगर शर्म ओढ़कर बैठे तो समझो करम फूटे |’’
मस्तराम जी ने कहा |
‘’ अब कक्का तुम्हारी सलाह है तो हम बिलकुल नहीं शरमायेंगे | चाहे कुछ भी काम हो बस चार पैसा जेब आना चाहिए |’ बबुआ थोड़ा जोश में आकर बोला |
‘’ हाँ टॉप सुनो ... आजकल सेक्स पॉवर बढाने वाली दवाईयां की खूब मांग है | तुम भी बनाकर बेचो |’’
‘’ये तुम क्या कह रहे हो कक्का |’’बबुआ कुछ सिटपिटाते हुए बोला- ‘’ लोग का कहेंगे |’’
‘’ अरे मूर्ख तुझे क्या मालूम... आज के समय में जीतनी कैंसर व ब्लड प्रेशर नामक रोगों की दवा नहीं बिक रही भारतीय मुद्रा में उससे कहीं ज्यादा सेक्स पॉवर वाली दवाएं बिक रही हैं | समझा |’’ मस्तराम जी भौहें तानकर बोले |
‘’ अगर किसी अधिकारी ने पकड़ लिया तो |’ बबुआ बोला |
‘’ का सड़क किनारे ये दवाएं नहीं बिक रही ? जो तुम जैसे नंगे को पकड़ेगें ...| अगर पकड़ें भी गए तो आधी दवाई मुफ्त उन्हें दे देना |’’
‘’ पर बनायेंगे कैसे ?
‘’ अब ये भी हम ही से पूछोगे तो सुन लो .... हल्दी , काली मिर्च  तीन प्रकार के मेवा और कुछ जड़ी-बूटी जो तुम जानते हो .... सबको मिलाकर बारीक पीस लो और पैकेट में भरकर आयुर्वेदिक के नाम से बेचो | मूल्य पहले ज्यादा बताना .... जब लोग कम में मांगे तो पहले न करना फिर दे देना |’’ मस्तराम जी ने सलाह भरे अंदाज में कहा |
‘’ कक्का कोई और दवा बताओ | इस दवा को बेचने में हमें शर्म आती है |’’ बबुआ बोला |
‘’ खाने वाले को शर्म नहीं आती तुझको बेचने में काहे शर्म आती है .... चल फूट .... निकम्मा कहीं का |’’ बबुआ ने वहां से खिसकने में ही खैरियत समझी |
अगले दिन पडोसी गाँव के ही रम्मूलाल जी, मस्तराम जी से सलाह मांग रहे थे | ‘’ कहो रम्मू कैसे आना हुआ |’’
‘’ क्या बताएं कक्का.... हम तो अपनी पड़ोसन से परेशान हैं | ‘’रम्मू गंभीर होकर बोला |
‘’ का आंख मारती है .... जो तुम अधेड़ होकर परेशान हो |’’ मस्त राम जी ने मस्त मस्त अंदाज में कहा |
 ‘’ मजाक की बात नहीं है कक्का | का है कि उस औरत ने दो साल पहले हमसे पांच हजार रुपये कर्जे में लिया था | अब हम जब केवल मूलधन मांग रहे हैं तो हमें धमकी दे रही है | ब्याज देने की तो कुब्बत ही नहीं है उसमें | ‘’
‘’ का धमकी दे रही है ?’ मस्तराम जी कान खुजलाते हुए बोले | ‘’ छेड़छाड़ के केस में फंसा दूंगी|’’
‘’ तुम का बोले | मस्तराम ने अगला प्रश्न किया |
‘’ का बोलते ... चुप रहे |’’ रम्मू बोला |
‘’ बेवकूफ बोल देते पहले छेड़छाड़ कर लेने दो फिर फंसवा देना |’’
‘’ये तुम का सलाह दे रहे हो कक्का हमें उससे पंगा थोड़ी न लेना | हमें तो अपने पैसे वसूलना है |’’ रम्मू बोला ‘’अगर पैसे नहीं दिए तो ,......|’
‘’ का करेंगे चुपचाप भूल जायेंगे | ‘’
‘’ फिर सलाह माँगने काहे आये हो ....|’’रम्मू लाल खामोश होकर रह गए |
    सलाह मिली भी तो ऐसी , उगलने की न निगलने की |

        सुनील कुमार सजल  

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

व्यंग्य – खूबसूरती के पुजारी

व्यंग्य – खूबसूरती के पुजारी




खूबसूरती हर किसी को फ़िदा कर देती है | खूबसूरती के दीवानों से उनकी दीवानगी पुछिए| ऐसे खिल उठाते हैं जैसे ताल में कमल | बदन में गुदगुदी , ‘ होठों पर मुस्कान से लबरेज होकर अतिश्योक्ति पूर्ण बखान करते हैं | यदि खूबसूरती के फ्रेम में प्रेमिका हो तो क्या कहने उनके
वे भी खूबसूरती के पुजारी हैं | वे इसके पुजारी क्यों बने | इसका पता तो बाद में चलेगा | फिलहाल यह जान लें कि ख़ूबसूरत सूरतों ने उन्हें कवि  बना दिया | कभी-कभार शायरी भी मार लेते हैं वे | शायरी वाही गांव की बोली वाली |चाँद का टुकड़ा , गुलाब का फूल , खुशबू भरा ख़त , तारों के झुमके वाले प्रतीकों से युक्त छान्द्विहींन | शायरी मात्र तुकबंदी |
वे कहते हैं –‘’ शायरी या कविता तो हम लिखते हैं यार | इत्तई है कि तुम छंद शास्त्र लिखते हो | अपने को यह सब बकवास पसंद नहीं |’’
वे चरस गांजा व दारू तो लेते नहीं | हां बीडी सिगरेट फूंक लेते हैं | कहते हैं- ‘’ जीवन में एकात नशा होना जरूरी है |’’ पर असली नशा उन्हें खूबसूरती का | यूँ तो ख़ूबसूरत है | मगर कृत्रिम नशा उन्हें खूबसूरती के लिए चहरे पर ब्यूटी पार्लर में पॉलिश करवाते हैं |
एक दिन वे बता रहे थे | एक ख़ूबसूरत लड़की को उन्होंने पहली बार छेदा | पर वह भी गुंडे की छोरी निकली | जमकर ठुकाई हुई | साब वे तो बाख गए कि बाप ने कट्टा नहीं ताना | वे बताते हैं –‘’ हमारे शयन कक्ष में कभी आकर देखें | कैसे – कैसे पोस्टर लगे हैं | कैसी-कैसी ख़ूबसूरत लड़कियां | यार लगता है | खूबसूरती की दुनिया में हामी बादशाह हैं |’’
एक दिन ख़ूबसूरत लड़की दिख गयी | साली आँखों से दिल तक उतर गयी | रातों की नींद गायब हो गयी | ऐसा लगता काश वह हमारी किस्मत में होती | पर हमारी किस्मत ने हमें झोपड़ी में पैदा किया | वो महलों की रानी , हम झोपड़ी के राजा कैसे तालमेल बैठे |
काश! हमें रिक्शा  चलाना आता | उनसे विनती करते मैडमजी आप प्रतिदिन कॉलेज जाती हैं | हमारे रिक्शे पे जाया करें | हम मुफ्त में पहुंचा दिया करेंगे | या फिर आप जीतता देंगी उत्ते ही रख लेंगे | पर अपनी फूटी किस्मत को क्या कहें | एक पुरानी साइकिल भी नसीब नहीं हुई | तो रिक्शा क्या चलाएंगे |
एक सयाने हमारे रोग को भांप कर समझा रहे थे | नश्वर संसार की खूबसूरती पर विश्वास न करना | वरना पछताओगे | सयाने को कैसे समझाते | बुढऊ अनुभव लेने के पहले आप भजी डूबे होंगे | इस नश्वर संसार की खूबसूरती में | ऐसे थोड़े ही सीख मिली होगी | सयाने उसे समझा रहे थे | खूबसूरती से प्रेम करना हो तो नदी ,पहाड़ , जंगल की खूबसूरती से प्यार करो | बुढऊ को कौन समझाता , ये सब चीजें सिर्फ  दूर से अच्छी लगाती हैं | पास से देखो तो जैसे हम | वे कह गए कर्म ही पूजा है | हम भी तो वाही कर रहे हैं | कर्म की पूजा कर उस ख़ूबसूरत को पाना चाहते हैं | पर डर लगता है | साहस बढाने वाली कोई दवा बाजार में नहीं बिकती | दवा बनाने वाली कंपनियाँ हम जैसे प्रेमी की तरफ क्यों नहीं देखती | यार उन्हें जब से देखा है | खाया-पीया अंग नहीं लगता | सांस-सांस में उनकी याद बसी है | प्रभु दर्शन के वक्त उनकी सूरत दर्शन देती है | सच्ची | पर कहते हैं न सोचो वह सदैव हासिल नहीं होता | यही तो बेरहम वक्त की रीत है | वे तो तड़प की रीत जी रहे हैं | परन्तु पड़ोस के एक दादा का कहना है | खूबसूरती पर कीड़े लगते हैं | उनका यह दर्शन कृषि आधारित था | जिंदगी भर खेती बाडी में उलझे रहे | दादा का दर्शन अपने खेत बगीचों में लहलहाती ख़ूबसूरत फसलों से प्रभावित रहा है |मगर दर्द का दूसरा पहलू यह भी था | ‘’ यार वैज्ञानिक कृत्रिम हाथ-पैर बना रहे हैं | क्रित्रम कोख क्यों नहीं बनाते |’’ जिसमें खूबसूरती की पूरी क्षमता हो |
हमने कहा –‘’ मूल्य तो उसी चीज का होता है न जिसकी मात्रा या संख्या कम होती है | यदि सभी ख़ूबसूरत पैदा हिने लगे तो ख़ूबसूरती का मूल्य ही क्या रह जाएगा |उनका क्या होगा जो ब्यूटी फुल या हैण्डसम बनाने के पार्लर , चिकित्सालय व दुकानदारी खोल बैठे हैं | वे बोले- -‘’ यार भूलो मत | धंधेबाज धंधा जमाने के सारे फंदे निकाल लेते हैं | कल वे ख़ूबसूरत बनाने की नई होड़ पैदा करलेंगे | और दुनिया इसी होड़ में फंसकर खुद को अब्वल महसूस कराती रहेगी |
ख़ूबसूरत बनने को होड़ तो यूँ भी मची है | तरह –तरह के चेहरों पर तरह- तरह की छाप  | कभी – कभी तो बदसूरत व ख़ूबसूरत में फर्क करना टेढ़ी खीर हो जाता है |

                         सुनील कुमार ‘सजल’

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

व्यंग्य - इनकी...उनकी...सबकी दीवाली

व्यंग्य - इनकी...उनकी...सबकी दीवाली


दीवाली की तैयारियां जोरों पर | जैसे राष्ट्रीय खेलों की तैयारियां |घर आँगन , इमारतें सब नए-नए-रंगों में रंग गए | शारदीय माहौल में धुप भी कुनकुनी हो चली है | दीवाली आने पर सबकी ख़ुशी अलग ही नजर आती है | इस बार हमने सोचा किइस मंहगाई के माहौल में दीवाली के प्रति लोंगो का नजरिया जान लिया जाए |कारण की अन्य त्यौहार तो फीके हो चले हैं |
सबसे पहले हम रमुआ मजदूर से मिले | वह कहता है , ‘’ इस बार तो बीते सालों की अपेक्षा जानदार दीवाली होगी अपनी |’’
‘’ ऐसा कौन –सा गदा धन मिल गया तुझे , जो तेरा दीवाला निकालने वाली इस बार अपार ख़ुशी प्रदान कर रही है |’’ लक्ष्मी जी सदा सहाय करे ‘’ की तर्ज पर ?’’
हमने कहा तो वह हमारी बातों पर खिलखिलाकर हंस पडा , ‘’ भैया, ग्राम पंचायत में अपना भी रोजगार गारंटी योजना के तहत जॉब कार्ड बन गया है पर अपन वहां की मजदूरी में नहीं जाते |’’
‘’ काहे ?’’ ‘
‘’ अपन सेठ के यहाँ अनाज तोलकर ज्यादा कमा लेते हैं |’’
‘’फिर मुझे जॉब कार्ड की बात क्यों बता रहा है ‘’
‘’ भैया , हमने एक चालाकी अपना ली है | वह यह कि हमारे कार्ड में सरपंच सचिव से सांठगांठ के तहत हमारी मजदूरी भर देते हैं | बदले में वह 50 परसेंट रकम अपने पास रख लेते हैं | अब आप ही बताइये , हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू है न ! फिर अबकी दीवाली काहे न दीवाली जैसी लगेगी ?’’
     इधर सेठ रायचंद जी की राय है , ‘’ देखो भाई , अपन ठहरे व्यापारी | लाभ का धंधा तो करंगे ही |इसलिए इस बार हमने गरीब आदिवासी कोसानों को पूरी बरसात नमक व मार्केटिंग सोसायटी से जुगाड़ किया हुआ नंबर दो का चावल पूरा किया | अब उनकी फसल आयी तो कर्ज चुकाने के एवज में उनकी कीमती फसल काटकर अपने गोदाम में ले आए | अब सोच रहे हैं कि इस फसल को बेचकर अपनी कालेज जाती बिटिया के लिए धनतेरस के दिन कार खरीद  दें |’’
     क्षेत्र के अधिकाँश किसान खुश हैं | उन्होंने इस बार अच्छी बरसात होने से अच्छी फसल काटी है | साथ ही एक दो बार आई बाढ़ से हुई न के बराबर क्षति का पटवारी से सांठगाँठ कर सरकार से मुआवजा भी घोषित करवा लिया है | पटवारी जी भी खुश हैं | अपनी अनाज कोठी को तरह किसानो ने इस दीवाली में उनकी जेब की कोठी भर दी है |
 ठेकेदार रामदीन कहते है, ‘’ भैया दीवाली आई तप ‘’ लक्ष्मी कृपा ‘’ बनाकर आई | हमारा मतलब आखिरी बरसात पुलिया में लगाए ‘’ चूना-रेत ‘’ को बहाकर ले गई | इस तरह अपनी अमावसी करतूत दीवाली जैसी जगमग ईमानदारी में बदल गयी |अफसर तो पहले से ही पते-पटाये हैं | नोटों की गड्डी देखकर वे हमारे पक्ष में बीन बजाने लगते हैं |’’
सूखा पीड़ित जनता भले ही दर्द वा भूख से कराह रही है मगर नेता, अफसर , कर्मचारी सूखा राहत पॅकेज से कमीशन काटकर दीवाली की तैयारी में जुटे हैं | वे यह गुना-भाग लगा रहे हैं कि ‘’ ब्लैक मनी’’  को इस दीवाली में व्हाइट मनी कैसे बनाया जाए |
   इधर हमारे कुछ लेखक मित्र पिछले 10 वेशों में ‘’सखेद वापिस ‘’ दीपावली से जुडी रचनाओं में से चुनिंदा रचना खंगालने में लगे रहे | कुछ तो सारी  रचनाओं का मुख्य अंश जोड़कर एक-दो रचना बनाने में जुटे रहे  |ताकि अब की बार सम्पादक जी की इनायत उन पर हो जाए और दीप अंक में उनकी रचना ‘दीप’’ की भांति टिमटिमाये |
हमने अरमान जी पूछा –‘’ आप ने दीप अंक’’  पर क्या लिखा हैं ?’’
‘’ क्या लिखेंगे ? पांच पहले लौटकर आई रचनाओं को पुन: भेज दिए हैं| ‘’
पुराना मेटर?’’
‘’ तिजोरी में बंद सोने की तरह बेकार पड़ी रचनाएं कब काम आती?’’
‘’ अगर पुन: अस्वीकृत होकर लौटा दी गई तो ..?’’
‘’ अबकी बार लौटकर नहीं आएंगी |’’ उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया |
‘’ क्यों ?’’ वापसी के लिए लिफाफा नहीं भेजा है क्या ?’’ हमने प्रश्न का आतिशवाजी राकेट उनकी ओर छोड़ा तो वे थोड़ा फुलझड़ी की तरह चिढ़कर बोले ‘’ ऐसा नहीं यार , अब अपन नामी लेखक हो गए हैं | जो भी लिखते हैं सब छपता है | ‘’
‘’ लेकिन महाशय ! स्तर भी तो कोई चीज है | बिना उच्च स्तर वाली रचनाएं भला छप सकती है ?’’
 वे हमारे जवाब से तुनक सा गए , देखी, अपना काम राक्चानाएं भेजना छापना न छापना उनकी मर्जी |’’
हमने उनकी खीझ देखकर बातों का रूख बदल दिया |
  अबकी बार हम भी अपनी पत्नी के मुख से दीवाली पर टीचर बनाम फटीचर जैसा अपमानजनक शब्द सुनने से वंचित  रहे हैं |इसका कारण यह है कि हम गऊ कहलाने वाले मास्टरों ने छात्र-छात्राओं में बांटी जाने वाली साइकिलें , ड्रेस , मिड डेमील व स्टेशनरी खरीदी से कमीशन निकालना सीख लिया है | अभी तक हमारी जिंदगी ईमानदारी की उबड़-खाबड़ पगडंडी पर ही दौड़ रही थी  मगर अब भ्रष्ट कारनामों की काली पक्की सडकों पर दौड़ना शुरू कर चुकी है | इस बात का अंदाजा आप दीवाली पर किए जाने वाले खर्च से लगा सकते है |
अंत में , दीवाली की शुभकामनाएं देते हुए हम तो यही कहेंगे की अगर आप भी पूरे जश्न से दीवाली मनाना चाहते हैं तो हमारे अपनाए तौर-तरीके पर आ जाइए , फिर देखी हर काली रात भी लगेगी दीवाली |

     सुनील कुमार सजल 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

व्यंग्य- किसान रोज मरता है.....

व्यंग्य- किसान रोज मरता है.....


किसान रोज मरता है | किस्तों वालों मौत | कभी प्राकृतिक आपदा से, कर्ज से, शासन-प्रशासन की अनदेखी से |
हाल की खबरें हैं-किसान मर रहे हैं रोजाना | सब को पता है | गाँव से राजधानी तक गूँज किसानों की मौत की | मीडिया की मुख्य खबरें |बहस , समाचारों के लंबे कार्यक्रम |किसान मर रहे हैं और सरकार ध्यान नहीं दे रही | तरह –तरह की बयानबाजियां  | पक्ष- विपक्ष बयानबाजियों से एक दूसरे की खिचाई करने में व्यस्त | राजनेता सत्ता व राजनीति का मरहम लिए किसान के दरवाजे पर घडियाली आंसू की धार बहाते नजर आरहे हैं |
 राजनीती में बयानबाजियों का दौर चालू है |बयान  भी ऐसे  खम्बा नोचने वाले बिल्ली की तरह | ‘’कई दिनों से बीमार था हल्कू , | दरअसल इसलिए आत्महत्या कर लिया | सरकार इसकी जांच करा रही है |
सरकार हमेशा जांच कराती है मौत पर जिसकी रपट कम से कम दो से तीन माह में आती है | जब तक दो चार किसान और आत्महत्या कर सरकार के लिए जांच का अवसर गढ़ देते हैं |
‘’ यार फसल बर्बाद होने से मरा था न हल्कू | कर्ज का कित्ता बोझ था उस पर | मगर यार पानी तो बरसा था | फिर .. आत्महत्या ? शंकाएं , उलटे-सीधे सोच,बुजदिली की संज्ञा देते लोग ,किसान की मौत पर |  अपनी मौत से भयानक मौत बयानों के फंदे में उलझ कर मर रहे हैं किसान |
सरकार कहती है चिन्ता न करें किसान |वह उसके साथ है | जितनी बड़ी हो सकेगी ,उतनी बड़ी सहायता देगी सरकार | मगर कब ? यह सरकार को खुद पता नहीं | आदेशों की लाइने रोजाना छप रही हैं कागजों पर | आदेश दौड़ रहे हैं पूरी गति से राजधानी से होते हुए कलेक्टर,तहसीलदार से होते हुए पटवारी तक | फसल के नुकसान का आकलन करवा रही है सरकार |पटवारी के जिम्मे है फसल आकलन का काम | पटवारी है कि चतुर प्राणी है राजस्व तंत्र का |गाँव की राजस्व सत्ता उसके हाथ में | जमीन-जायदाद गाँव में उसकी चलती है |वह कब किसके बाप को भूमि के पट्टे में दूसरे का बाप बना दे |और असली बाप का बेटा हाथ मलता रह जाए |
किसान पटवारी के दरवाजे में निरीह प्राणी की तरह खडा है | हाथ जोड़कर – ‘’ पटवारी साब , हमारी बरबाद फसल का तनिक ऐसी रपट देना मालिक कि अच्छा मुआवजा बन जाए |’’
‘’यार , तुम लोग का पटवारी को खेत में लगी मूली समझ रखे हो | पटवारी को ऐसे सिखा रहे हो जैसे वह कुछ जानता ही नहीं | हमें खुदई पता है ,तुम्हारे खेत में कित्ती फसल लगी थी और कित्ती खराब हुई  है |समझे |’’ पटवारी पूरे साहबी अंदाज में बोला |
‘’ का है कि पटवारी साब आपकी कलम में खूब ताकत है , अगर आप अच्छा लिख दोगे तो अच्छा मुआवजा मिल जाएगा | पूरा नहीं तो कुछ तो खाद बीज का कर्जा  उतर जाएगा |’’
‘’ यार देखो हमारा दिमाग मत खाओ | का हम सरकार से गद्दारी करे , तुम्हारे कारण | तुम लोग बस अपना उल्लू सीधा करना चाहते हो | ये नहीं जानते कि सरकार कहाँ से मुआवजा की व्यवस्था करेगी | और तुम्हे देगी | तनिक सरकार की तरफ भी सोचो |’’
‘’ सरकार हम अपनी मारी किससे कहें | हमने जो सरकारी बीज ख़रीदे  थे मालिक उनमें सही अंकुरण नहीं हुआ |ऊपर से सूखा पड़ गया |’’
‘’यार तुम लोग न बस सरकार के भरोसे जीते हो | खेती का करते हो खाद, पानी बिजली सब सरकार  दे |ऊपर से फसल खराब हो गयी तो मुआवजा भी |तुम्हारे खीसा (जेब) में इतनी भी पूँजी नहीं है ..|’’
‘’ मालिक का बताएं ... कित्ते जतन से फसल उगाये थे , | मगर फसल नई आयी | मालिक कृपा कर तनिक हमारे मुआवजे के लाने सोच लो मालिक ...|’’
‘’ अब तुम कहते हो तो सोच लेते हैं | मगर ये बताओ अपनी अंटी में कुछ रख के लाए हो ...|
‘’का मालिक ?’’
‘’अब इत्ता भी नहीं मालूम...पटवारी साहब से मिलने पर क्या लाना पड़ता है |’’
‘’ खाता – बही मालिक ...|’’
‘ अरे यार ,.. तुम लोग न भोलू चंद हो ...खर्चा पानी .. समझे |’’
‘’ मालिक मुआवजा मिल जाने दो ... या फिर थोड़ी बहुत जो फसल है बिक जाने दो हम खुद दे देंगे | उसकी चिन्ता मत करो मालिक ....आप तो हमारी सरकार हैं  |’’
‘’ तुम लोग न जैसे खेती-बाड़ी उधारी में माल बटोर कर लेते हो न वैसई सरकारी काम को भी समझ लेते हो .....भैया सरकारी काम कोई बनिया की दुकान नहीं है |जब ईच्छा हुई मांग लाये उधारी |जाओ पहले व्यवस्था करो | फिर आना | जैसा तुम्हारा दिया खर्चा , वैसा बनेगी तुम्हारी सूखी फसल की रपट | समझे भोलू ...|
   किसान क्या समझे | उसकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि सरकार उसके साथ है या उसके घूसखोर कर्मचारी | हताश है बेचारा किसान | क्या  बेच दे , क्या नहीं ..और पटवारी साब को खुश करे | बेचारा न घर की इज्ज़त बेच सकता और न ही कर्ज में फंसी जमीन | बेचारे के पास हताशा से बचने का और रास्ता ही क्या है ....यह तो आप अखबारों की सुर्ख़ियों में पढ़ रहे हैं |
सरकार भले ही अपने विज्ञापन में कह रही है –‘’ खुशहाल किसान ,खुशहाल देश |मगर कौन खुश है यह तो आपको भी पता है और सरकार को भी ....|फिर भी बहस जारी किसान की किस्तों वाली मौत पर , सरकार किसानो के साथ है |

               सुनील कुमार ‘’सजल’’